Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
पदार्थब्रह्मरूपेण ब्रह्मैवात्मनि तिष्ठति ।
अवयवीवावयवे खे खं वारीव वारिणि ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
पदार्थों के रूप से या ब्रह्मरूप से अपने स्वरूप में ब्रह्म ही स्थित है। जैसे कि अपने
अवयवों में अवयवी (वृक्ष आदि), आकाश में आकाश और जल में जल स्थित रहता है