Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 34, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 34, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 34 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
निमेषादर्धभागेन देशाद्देशान्तरस्थितौ ।
यद्रूपं संविदो मध्ये स स्वभाव उपास्यताम् ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
चिति की वास्तविक स्थिति तो ।निर्विषयक ही है, यह कहते हैं ।
एक निमेष के अर्धभाग से एक देश से देशान्तर की स्थिति में जो मध्य में ज्ञान की स्थिति
है, उस स्वभाव की ही आप उपासना कीजिए