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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 1

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । देशाद्देशान्तरं दूरं प्राप्तायाः संविदः क्षणात् । यद्रूपममलं मध्ये परं तद्रूमात्मनः ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

विरोधाभाग्रोक्तियों से सश्चन्ध और अक्षुब्ध दो रूपों से युक्त ब्रह्म का विस्तारपूर्वक वर्णन करने की इच्छा रखनेवाले महारज करिष्ठजी पूर्वोक्‍्त उपाय से परिचित अक्षुब्धरूप का उसमें अपनी दढ स्थिति बनाने के लिए पहले स्मरण कराते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, क्षणभर में ही क्रमश: एक देश से दूसरे अत्यन्त दूर देशतक प्राप्त संवित्‌ का (ज्ञान का) दोनों देशों के बीच में जो निर्मल निर्विषयकरूप है वही परब्रह्म परमात्मा का वह सर्वोत्कृष्ट अक्षुब्धरूप है

सर्ग सन्दर्भ

चौंतीसवाँ सर्ग समाप्त पैंतीसवाँ + पैतीसवों सर्ग प्रपंचसहित तथा प्रपंचरहित ब्रह्मतत्व की अखण्ड एक दृष्टि के लिए सत्य ओर असत्य दोनों तरह के भासमान ब्रह्म के स्वरूप का विस्तारपूर्वक वर्णन |