Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
गच्छन्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नुन्मिषन्निमिषन्हसन् ।
नूनं निरामयत्वाय नित्यमेतन्मयो भव ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, निरामय होने के लिए यानी निर्वाणपद
की प्राप्ति के लिए चलते, सुनते, स्पर्श करते, सूँघते, जागते तथा हँसते हुए आप इसी निर्विषय
नित्य चिद्रूप में अवश्य तन्मय हो जाइये