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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

तत एव निराभासात्सत्यान्निर्वासनैषणात् । यथास्थितं यथाचारमचलाऽमरशैलवत् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जीवन्मुक्तों की स्थिति तथा अपने कुल के आचार के अनुसार सब व्यवहार करते हुए उसी निराभास, सत्य तथा वासना और इच्छादि से शून्य चितिस्वरूप से सुमेरु पर्वत के समान, कदापि चलायमान न होना ही अर्थात्‌ उसमें दृढ़ स्थित रहना ही विद्या है