Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
आलोकि ध्वान्तघनवन्नववच्च पुरातनम् ।
परमाणोरपि तनु गर्भीकृतजगद्गणम् ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वप्रकाश होने पर भी सघन अन्धकारयुक्त के
समान, पुरातन होने पर भी नवीन के समान, परमाणु से भी सूक्ष्म तथा अनेक जगत् को अपने
उदर के भीतर धारण किये हुए वह ब्रह्म स्थित है