Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
जगद्रत्नमहाकोशं तुलायां तूलकाल्लघु ।
मायामरीचिशशिनमपि नेक्षणगोचरम् ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माण्डात्मना जगद्रूप रत्नों का महाकोश अर्थात्
अत्यन्त वजनदार होने पर भी विवेक की तराजू पर तौलने से रुई से भी अत्यन्त लघु (हलका)
तथा मायारूपी किरणजाल का चन्द्रमा होने पर भी वह ब्रह्म ईक्षणगोचर (दुष्टिका विषय) नहीं
हे