Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अनन्तमपि निष्पारं न च क्वचिदपि स्थितम् ।
आकाशे वनविन्यासनगनिर्माणतत्परम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
काल और देश से अनन्त तथा अपार होने पर भी कहीं एक नियत स्थानपर स्थित न
रहनेवाला एवं शून्यस्थान में भी वनविन्यास तथा पर्वत आदि की रचना में तत्पर वह ब्रह्म है