Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अकर्तृकर्मकरणमकारणमकारकम् ।
अन्तःशून्यतयैवैतच्चिराय परिपूरितम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
कर्ता, कर्म और करण से रहित, कारणशून्य, कारक तथा अन्तःशून्य होने के कारण
ही यह ब्रह्म चिरकाल से कर्ता आदि से परिपूर्ण स्थित है