Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
बिभर्ति सर्वमङ्गस्थं तुषारमिव शुक्लताम् ।
भाति सर्वस्त्वनेनैव तुषारेणेव शुक्लता ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे
तुषार अपने अंग में शुक्लता धारण करता है, वैसे ही यह चेतन स्थावर-जंगमात्मक सारी सृष्टि को
अपने भीतर धारण करता है । जैसे तुषार से शुक्लता सुशोभित होती है, वैसे ही इस चेतन से ही
यह सारी सृष्टि शोभित हो रही है