Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verses 33–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verses 33–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
एतस्माद्रङ्गतोऽनङ्गाज्जगच्चित्रमिदं स्थितम् ।
विद्ध्यभावविकारादिशान्तमेतन्मयं ततम् ॥ ३३ ॥
अस्माद्वनतरोरेताः स्वरूढा गगनाङ्गणे ।
दृश्यशाखाः प्रवर्तन्ते जगज्जालगुलुच्छकाः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी निरवयव चितिरूप रंग से चित्रित यह
सम्पूर्ण जगत्स्वरूप चित्र स्थित है इसलिए हे श्रीरामजी, इस जगत् को आप जन्मादि
भावविकारों तथा स्वगत विचित्रताओं से शून्य एवं शान्त चिन्मय ही जानिये