Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
इदमेव जगत्सर्वं शुक्लत्वं तुहिने यथा ।
अत एताः प्रवर्तन्ते विद इन्दोरिवांशवः ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
तुषार में शुक्लता की नाई यह ब्रह्म ही सम्पूर्णं जगत्
है । अतः इसी चितिरूपी ब्रह्म से ये समस्त पदार्थों की शोभाएँ, चन्द्रमा से किरणों की नाई,
प्रवृत्त होती है - विस्तार को प्राप्त होती हैं