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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 31

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 31 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 31

संस्कृत श्लोक

शाम्यत्यत्र पदार्थश्रीः सर्वासामेव भास्वति । एतस्मादेव चोदेति स्वालोक इव तेजसः ॥ ३१ ॥

हिन्दी अर्थ

सूर्य, चन्द्र, अग्निकण आदि सभी प्रकाशों की रूपादि पदार्थशोभा इसी चितिरूपी सूर्य में सुषुप्ति और प्रलय में शान्त हो जाती है तथा जाग्रत्‌ और स्वप्न में, सूर्य आदि के तेज से अपने प्रभामण्डल की नाई, इसीसे उदित होती है