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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

अस्याम्भसो द्रवत्वं यत्तदिदं जगदुच्यते । संवित्स्यादूपलम्भाङ्गं भुवनावर्तवृत्तिमत् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

इस चितिरूपी जल का जो द्रवत्व है वही यह जगत्‌ है, जिस जगत्‌ के संवित्‌ से ही स्वादपूर्वक उपलब्ध हो रहे रूप, रस आदि एक अंग हैं तथा भुवनरूप आवर्त की जिसमें अनेक वृत्तियाँ हैं