Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 37
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 37 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 37
संस्कृत श्लोक
जगत्कोटिमहाकल्पकल्पोन्मेषनिमेषणः ।
विताने नाट्यते भूयो जन्यते कालबालकः ॥ ३७ ॥
हिन्दी अर्थ
जिसके नेत्रो के उन्मेष और निमेष में अनेक ब्रह्माण्डों के महाप्रलय ओर अवान्तर प्रलय
हुआ करते है एसे कालरूपी अपने बालक को ब्रह्मरूपी रंगभूमि के मायामण्डप के भीतर यही
नियतिरूपी नर्तकी बार-बार उपसंहार तथा पुनः -पुनः उत्पन्न कर नाच रही है