Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 35, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 35, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 35 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
अशून्यं शून्यमिव च शून्यं वाऽशून्यवत्स्फुटम् ।
स्फारमस्फारमिव तदस्फारं स्फारसन्निभम् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
अशून्य होने पर भी प्रलय में शून्य के समान तथा शून्य होने
पर भी सृष्टि-काल में अशून्य के समान वह स्पष्ट भासता है। देश और काल से अपरिच्छिन्न होने
पर भी वह परिच्छिन्न के सदृश तथा अविस्फारित (विशाल देश, काल आदि से शून्य) होने पर भी
वह विस्फारित (विशाल देशकालादि) के समान सद्रूप स्थित है