Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 36, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
स्पृश्यन्तां स्पर्शनीयानि यथाप्राप्तान्यवासनम् ।
कूटागारवदक्षुब्धमनिच्छममनोदयम् ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
नट, भट, वेश्या आदिकों के निवासगृह के समान इच्छारहित, मन के उदय से
शून्य, वासनारहित तथा अक्षुब्ध हो आप लोग प्रारब्धप्राप्त सकू, चन्दन, वनिता आदि स्पर्शनीय
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