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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 18

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 36, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 18

संस्कृत श्लोक

स्वाद्यन्तां रसजालानि विगतेच्छाभयैषणम् । अपरागाभिलषणं यथाप्राप्तानि दर्विवत् ॥ १८ ॥

हिन्दी अर्थ

इच्छा, भय और एषणाओं से शून्य तथा राग और अभिलाषाओं से रहित हो आप लोग दर्वी (कलछी) के तुल्य अनेक तरह के प्रारब्ध प्राप्त रसों का आस्वाद लेते रहे