Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 36, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
यः स्वादयन्भोगविषं रतिमेति दिने दिने ।
सोऽग्नौ स्वमूर्ति ज्वलिते कक्षमक्षयमुज्झति ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
जो मनुष्य भोगरूपी विष का आस्वाद लेते हुए प्रसन्नता को प्रतिदिन प्राप्त होता है वह प्रज्वलित
हो रही अग्नि में अपनी मूर्तिरूपी तृणपुंज को निरन्तर फेंकता रहता है