Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 36, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
यथा यथेच्छा घनतां याति लोकस्य रागतः ।
तथा तथा विवर्धन्ते दुःखचिन्ताविषोर्मयः ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
और जैसे-जैसे मनुष्य की भोगों में इच्छा रागतः सघन बनती-जाती
है वैसे-वैसे दुःखों की चिन्तारूपी विषैली तरंगें बढ़ती ही जाती हैं