Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 36, Verse 32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 36, verse 32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 36 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
दुःखप्रसवशालिन्या बीजमिच्छैव संसृतेः ।
सम्यग्ज्ञानाग्निदग्धा सा न भूयः परिरोहति ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
भोग की इच्छा का आत्यन्तिक नाश तो ज्ञान द्वारा उसके यूल का नाश होने से ही हो सकता
है, यह कहते हैं ।
दुःखरूपी पुष्प और फूल आदि से सुशोभित संसाररूपी लता का बीज इच्छा ही है। वह
आत्मज्ञानरूपी अग्नि से भलीभाँति दग्ध हो जाने पर फिर नहीं अंकुरित होती