Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 21
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
न सज्जगदहंतादौ दृश्ये ब्रह्मेतरत्तथा ।
श्रीराम उवाच ।
एवं चेत्तदुदेत्विच्छा मा वोदेतु मुनीश्वर ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि सव कुछ ब्ह्ल ही है, तो फिर उसकी इच्छा भी तो ब्रह्म ही ठहरी, उसकी उत्पत्ति मानने
में क्षति क्या हैं, यों विद्वानों की द्राष्टि से श्रीरामचन्द्रजी आशंका करते हैं ।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनीश्वर, यदि बात ऐसी है, तो फिर इच्छा का उदय हो या न हो,
(कोई हानि नहीं है,) क्योंकि वह भी तो ब्रह्म ही ठहरी इसकी विधि और निषेध में कौन-सा
मतलब सिद्ध होगा ? (यह कहिये)