Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 27
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
विरक्ततास्य नो दृश्ये नोदेत्यत्रास्य रक्तता ।
केवलं द्रष्टृदृश्यश्रीः स्वदते न स्वभावतः ॥ २७ ॥
हिन्दी अर्थ
उस
पुरुष को न तो इन दृश्य पदार्थो में वैराग्य उत्पन्न होता है ओर न उसको राग ही उदित होता
है । केवल स्वभाव से ही द्रष्टा और दृश्य की शोभा उसे नहीं रुचती