Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
निर्भागावयवा सूक्ष्मा व्योम्नः शून्यतरैव चित् ।
सैवाहंजगदाकारा सती किं तत्तयेष्यते ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामजी, यदि आत्मा से भिन्न कोई पदार्थ यहाँ हो, तो आप उसकी बेरोक-
टोक इच्छा कीजिये (उसके लिए हम आपको कुछ नहीं कहते परन्तु आत्मा से भिन्न जब किसी
दूसरे पदार्थ की सत्ता ही नहीं है, तो भला बतलाइये तो ग्रह) आप अपनी इस आत्मा से भिन्न
किसकी इच्छा कर रहे हैं ? कहने का तात्पर्य यह कि जब तक आत्मतत्त्व का भलीभाँति ज्ञान नहीं
हो जाता, तभी तक द्वितीय वस्तु में सत्यता की भ्रान्ति से इच्छा का उदय होता है, इसलिए हे
श्रीरामजी आत्मज्ञानयोग ही उसकी निवृत्ति में एकमात्र उपाय है।
यह जयत् सत्य ब्रह्मरूप ही है, मिथ्या नहीं हैं, यदि ज्ञान से आप ऐसा मानते हों, तो भी बलह्य
ओर जयत् इन दोनों में अत्यन्त अभेद होने से त्रिपुटीघटित इच्छा की कभी सिद्धि नहीं हो सकती,
यह कहते हैं।
त्रिपुटी के विभाजक उपाधियों के भेद तथा विभक्त होनेवाले अवयवों के भेद से रहित, सूक्ष्म
और आकाश से भी अत्यन्त शून्यरूप जो चिति है, सत्यस्वरूप वही अहमाकार तथा जगदाकार से
स्थित है । तो फिर आप उससे भिन्न किसकी इच्छा कर रहे हैं