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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

सा व्योमरूपा व्योमैव व्योमात्मवेद्यवेदिका । व्योमात्मजगदाभासमत्रेच्छाविषयोऽस्ति कः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

वह चिति आकाशरूप हे । आकाश ही आकाशरूप विषय और उसका ज्ञाता है । यह जगत्‌ का आभास भी आकाशरूप ही है, तब भला इसमें इच्छा का विषय ही कौन है ?