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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 5

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 5

संस्कृत श्लोक

ग्राह्यग्राहकसंबन्धः कुतश्चिदिति तन्न नः । विद्यतेऽसौ प्रशान्तानां येषामस्ति न वेद्मि तान् ॥ ५ ॥

हिन्दी अर्थ

ज्ञान से विषयों के गृहीत न होने पर इच्छा का उदय न होने के कारण, ग्राह्म और ग्राहक के सम्बन्ध के अभाव में ग्रहण की भी सिद्धि न हो सकने से ज्ञानियों को इच्छा होती ही नहीं: यह कहते हैं / अज्ञानियों की दृष्टि में प्रसिद्ध ग्राह्य और ग्राहक का सम्बन्ध प्रशान्तचित्त हम लोगों की दृष्टि में किसी भी निमित्त या प्रमाण से विद्यमान नहीं है। इसलिए भी हे श्री रामजी, बतलाइये आप किसकी इच्छा कर रहे हैं ? जिन अज्ञानियों की दृष्टि में वह है, उन्हें भी मैं आत्मा से अलग नहीं जानता, तात्पर्य यह कि सत्त्वदृष्टि से वे भी अत्यन्त अप्रसिद्ध हैं