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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

ग्राह्यग्राहकसंबन्धः स्वनिष्ठोऽपि न लभ्यते । असतस्तु कथं लाभः केन लब्धोऽसितः शशी ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

ग्राहक सम्बन्ध को स्वनिष्ठ (आत्मनिष्ठ) भी मान लिया जाय, तो भी वह उपलब्ध नहीं होता, क्योकि असत्‌ का लाभ कैसे हो आज तक किसने चन्द्रमा को काले वर्ण का देखा है ?