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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 30

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 30

संस्कृत श्लोक

ज्ञता चेदुदिता जन्तोस्तदिच्छास्योपशाम्यति । नैतयोः स्थितिरेकत्र प्रकाशतमसोरिव ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

भद्र, यदि किसी जीव को तत्त्वज्ञान प्राप्त हो गया, तो उसकी इच्छा तत्काल ही निवृत्त हो जाती है, क्योकि प्रकाश ओर अन्धकार के सदुश तत्त्वज्ञान ओर इच्छा दोनों की स्थिति एक जगह हो नहीं सकती