Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
तदस्य सेच्छा नेच्छा वा ब्रह्मैवात्र न संशयः ।
इच्छा न जायते ज्ञस्यावश्यमेवानु वा नवा ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
ऐसी परिस्थिति में उस आत्मतत्त्वदर्शी की वह इच्छा
या अनिच्छा दोनों ब्रह्मस्वरूप ही है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है । अथवा बात यह है कि
उस तत्त्वज्ञानी को अभिनवभोग चमत्कार विषयक इच्छा अवश्य नहीं उदित होती या पूर्वकाल
में अभ्यस्त हुए लोगों का अनुसरण करने के कारण उसकी स्थिति नियत है