Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 45
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
चूँकि समुद्र, आकाश, पृथिवी, नदी, पर्वत आदि से शून्य आत्मा में दरष्टा का अन्तःकरण
ही समुद्र आदि की शोभा के रूप में परिणत हो जाता है, इसलिए पूर्वोक्त बात सिद्ध है । (इस विष्य
में दष्टान्त हैं-मुयतृष्णा जलतरंग) क्योकि तृषार्त एवं श्रान्त पुरुष का नेत्ररूप करण ही जलशून्य
सामने के प्रदेश में मृगतृष्णा-जलतरंगरूप में परिणत हो जाता है