Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
स्वप्ननिर्माणपुरवद्वालवेतालतालवत् ।
यदिदं दृश्यते तत्र किं किलासत्यतेतरत् ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
जो कुछ यह दिखाई दे रहा
है वह स्वप्न में बने हुए नगर के सदृश एवं बालक द्वारा कल्पित उन्नत वेताल के सदृश मिथ्या ही
है । ऐसी स्थिति में उसमें असत्य को छोडकर दूसरा सत्यत्व ही क्या है ?