Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 47
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 47 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 47
संस्कृत श्लोक
असत्यमेवाहमिति भासते सत्यमेव च ।
भ्रान्तिभाजं विनैवेयं भ्रान्तिः स्फुरति सा सती ॥ ४७ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रान्तिगरस्त पुरुष स्वयं मिथ्या हैं, इससे भी श्रन्ति में मिथ्यात्व है, यह कहते हैं /
चूँकि सत्यभूत ब्रह्म ही "अहम्" “इदम्” इत्यादिरूप से असत्य होकर ही भासता है, इसलिए
भ्रान्तिग्रस्त पुरुष के बिना ही यह भ्रान्ति भासती है, अतः भ्रान्ति असत्य (मिथ्या) है