Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 48
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 48 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 48
संस्कृत श्लोक
न सन्नासन्न सदसत्किमपीदमतीन्द्रियम् ।
अवाच्यं जगदित्येव भात्यवक्षुभितं खवत् ॥ ४८ ॥
हिन्दी अर्थ
यह जो जगत् है, वह न सत् है और न असत् तथा न तो सत्-असत् उभयरूप है, इसका तत्त्व
भी किसी इन्द्रिय से निर्धारित नहीं किया जा सकता, यह अनिर्वचनीय ही है, इस रूप का होने
पर भी गन्धर्वनगर आदि से क्षुब्ध आकाश के सदृश प्रतीत होता है । सारंश यह है कि यदि
जगत् को अत्यन्त ही असत् मान लिया जाय, तो शून्यवादियों के मत में ही अपनी गिनती होने
लगेगी, यदि अत्यन्त सत् मान लिया जाय, तो श्रुति और तत्त्ववेत्ताओं के अनुभव के साथ विरोध
होगा । यदि सत्-असत् उभयरूप मान लें, तो विरोध होने के कारण एक वस्तु में सत्व ओर
असत्त्व दोनों धर्म कैसे रह सकते हैं, इस सब बातों से अन्त में यही निष्कर्ष निकलता है कि
जगत् का स्वरूप अनिर्वचनीय ही मानना होगा