Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
अहं जगदिति ज्ञप्तिः खे खस्येवेयमास्थिता ।
चिदात्मनो यथा वायोः स्पन्दो नात्रास्ति कारणं ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, आकाश में आकाश की नाई अविकृत
चिदाकाश में ही “आकाशाद् वायुः" (आकाश से वायु) इत्यादि श्रुति-दर्शित क्रम के अनुसार
"अहं जगत्” इत्याकारक चिदात्मा की कलना स्थित है, इसमें वायु में स्पन्दन की नाई दूसरे
किसी कारण की खोज नहीं करना चाहिए