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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 51

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 51 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 51

संस्कृत श्लोक

चितश्चेत्योन्मुखत्वं यत्तच्चित्तं सैव संसृतिः । सेच्छा तन्मुक्तता मुक्तिर्युक्तिं ज्ञात्वेति शाम्यताम् ॥ ५१ ॥

हिन्दी अर्थ

इन सव बातो से निष्कर्ष यह निकला कि चिति की बहियुखिता ही इच्छा, चित्त और ससार हैं तथा अन्तर्युखता ही युक्ति हैं, यह कहते हैं । भद्र, चिति की जो बाह्यविषयों की ओर उन्मुखता है, वही चित्त है, वही संसार है और वही इच्छा है तथा बाह्य विषयों की ओर से उन्मुखता को जो हटा देना है, वही मुक्ति है, इस युक्ति को जानकर आप शान्त हो जाइए