Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 53
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 53 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 53
संस्कृत श्लोक
इच्छानिच्छे सदसती भावाभावौ सुखासुखे ।
इत्यत्र कलना व्योम्नि संभवन्ति न काश्चन ॥ ५३ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें युक्ति बतलाते हैं ।
इच्छा-अनिच्छा, सत्-असत्, भाव-अभाव तथा सुख-दुःख ये सब कल्पनाएँ उस तत्त्ववेत्ता
के स्वरूपभूत चिदाकाश में कुछ हो ही नहीं सकती