Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 60
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 60 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
चित्त्वादनुभवत्येतामसत्यामेव देहिताम् ।
अविनष्टैव चिच्छक्तिः स्वप्ने स्वमरणं यथा ॥ ६० ॥
हिन्दी अर्थ
जड़ देहरूप होने पर भी वस्तुतः
चितिशक्ति अक्षत ही रहती है, विनष्ट नहीं होती, यही कारण है कि चिद्रूप होने से इस असत्य ही
देहिता का वह ऐसे अनुभव करती है, जैसे स्वप्न में अपनी मृत्यु का