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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 59

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 59 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 59

संस्कृत श्लोक

अहभावाच्चिदाकाशो जाड्यातिशयतः क्षणात् । पाषाणतां जलमिव मनस्त्वाद्याति देहताम् ॥ ५९ ॥

हिन्दी अर्थ

अमूर्त मन की श्रान्तिमात्र यह जगत्‌ मूर्त देहादिभाव को कैसे प्राप्त हो जाता है, इस पर कहते हैं। जिस प्रकार जाड्यातिशय के कारण यानी अत्यन्त शीतलता के कारण जल पाषाणरूप (बर्फ) को प्राप्त हो जाता है वैसे ही चिदाकाश मन के कारण देहाकारहंभाव से अर्थात्‌ देहादि में अहन्ता के अभिमान से देहाकारता को प्राप्त हो जाता है