Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 58
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 58 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
असता व्यवहारश्चेत्प्रेक्षामात्रविनाशिना ।
क्रियते शशशृङ्गेण तत्कथं छाद्यते न खम् ॥ ५८ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रान्तिभिद्ध वस्तु असल में असत् होने के कारण पारगार्थिक दुःखनिवारण में सामर्थ्या नहीं
रखती, यह कहते हैं /
जिसका विचारमात्र से विनाश हो जाता है, ऐसे भ्रान्तिसिद्ध असत् पदार्थ से यदि व्यवहार मान
लें, तो खरगोश के सींग से आकाश क्यों नहीं आच्छादित होता, इससे तत्त्वज्ञानाभिव्यक्त पारमार्थिक
ब्रह्म ही सर्वविध भ्रमों के निवारण का उपाय है, दूसरा नहीं, यह भाव है