Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 57
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 57 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 57
संस्कृत श्लोक
भ्रमभूतेन कुर्मश्चेद्व्यवहारमवस्तुना ।
तत्कस्मात्परचित्ताद्रिः कम्बलत्वं न नीयते ॥ ५७ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि श्रमचिद्ध किसी उपाय से ही श्रम की चिकित्सा करेंगे, तो इस पर कहते है/
यदि यह कहिये कि भ्रान्तिसिद्ध यानी हमारी भ्रान्ति से सिद्ध अवस्तुरूप किसी उपाय से अन्य
भ्रान्तिसिद्ध दुःख आदि का निवारण आदि व्यवहार हम कर लेंगे, तो इस पर हमारा यही उत्तर है कि
हम लोगों के मनोरथ से सिद्ध अत्यन्त विस्तृत मुख से दूसरे के स्वप्न में सिद्ध विस्तृत पर्वत क्यों
नहीं निगला जाता ?