Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 56
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 56 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 56
संस्कृत श्लोक
यान्कार्यकरणव्यूहान्कृतवान्पूर्वमेव तान् ।
संप्रेक्षया न पश्यामि मिथ्याभ्रमभरादृते ॥ ५६ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्माजी ने
प्राणियों के दुःखों की चिकित्सा करने के लिए जिन ओषध, मन्त्र, यन्त्र आदि कार्य-करणों का
निर्माण किया है उनकी परीक्षा के लिए पहले ही मैंने विचारपूर्वक प्रयत्न किया, परन्तु उनको मेने
मिथ्याभ्रान्ति के भार से आक्रान्त पुरुष की चिकित्सा करने में समर्थ नहीं पाया