Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
इच्छाक्षुरिकया विद्धे हृदि शूलं प्रवर्तते ।
जयन्ति यत्र नैतानि मणिमन्त्रौषधानि च ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
इच्छारूपी छुरी से विद्ध हुए हृदय में ऐसी वेदना उत्पन्न होती है कि
जिसके लिए ये प्रसिद्ध मणि-मन्त्र आदि महौषध सब कुण्ठित हो जाते हैं