Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 72
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 72 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 72
संस्कृत श्लोक
पर्वता गगनायन्ते गगनं पर्वतायते ।
संवेदनप्रयोगेण ब्रह्मणः सर्गता स्थितौ ॥ ७२ ॥
हिन्दी अर्थ
परन्तु यि मायाविलास़ द्रष्टि से देखते हैं; तो फिर सी पदार्थों में सर्वकृपता की यथेच्छ
उपपत्ति हो जाती हैं, यह कहते हैं ।
ब्रह्मा के सृष्टिरूप में विवर्तित होने पर संवेदन के प्रयोग से यानी विचित्र वासनाओं के अनुसार
उत्पन्न संकल्प से तो पर्वत भी आकाशरूप में परिणत हो सकते हैं और आकाश भी पर्वत बन
सकते हैं