Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 73
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 73 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 73
संस्कृत श्लोक
संविच्चूर्णप्रयोगेण निमेषार्धेन योगिनः ।
कुर्वन्ति जगदाकाशमाकाशं त्रिजगन्ति च ॥ ७३ ॥
हिन्दी अर्थ
संविद्रूप सिद्धौषधचूर्ण के प्रयोग से तो योगीजन आधे निमेष में जगत् को आकाशरूप
और आकाश को तीनों जगत् के रूप में कर डालते हैं