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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 8

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

एष एव स्वभावो यद्दृष्टृदृश्यक्षयोऽखिलः । ज्ञात्वाऽसत्या विनिर्वाणमहंतात्मनि गच्छति ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

और तत्त्वज्ञान का भी यही स्वभाव है कि असत्यरूप अहन्ता आदि अपना तत्त्व जानकर उस आत्मा में ही चले जाते हैं - लीन हो जाते हैं| द्रष्टा ओर दृश्य का वह सम्पूर्ण नाश ही विशिष्ट निर्वाण है