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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 9

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

निर्वाणे नास्ति दृश्यादि दृश्यादौ नास्ति निर्वृतिः । मिथोऽनयोरनुभवो न च्छायातपयोरिव ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

द्श्यादि ओर निवाण - इन दोनों का परस्पर अस्रहभाव भी स्वभावतः ही ह यह कहते हैं / निर्वाण में दृश्य आदि नहीं हैं और दृश्य आदि में निर्वाण नहीं है। छाया और धूप की नाई इन दोनों का परस्पर अनुभव यानी सहानुभव नहीं है