Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 10
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
उभे एते मिथोऽसत्ये असत्ये च न निर्वृतिः ।
यतो निर्वाणमजरमदुःखमनुभूयते ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
क्यो सह्ानुभव भी नहीं है 2 इस पर कहते हैं /
यदि ये दोनों साथ होते, तो परस्पर द्वारा बाधित हो जाने से दोनों असत्य हो जाते । असत्य
में निर्वृति नहीं है, क्योकि विद्वानों को निर्वाण अजर, अमर तथा दुःखशून्य अनुभूत होता है