Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
भ्रमभूतं च दृश्यादि नित्यं नात्र सुखप्रदम् ।
असच्च तद्भाव्यतां मा निर्वाणे स्थीयतामजे ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
तब तो स्र्वजनप्रप्निद्ध द्श्यावि महाकोतुक निकाणि में दुर्लभ ही होगा, इसका एरिहार करते हुए
कहते हैं।
दृश्य आदि भ्रमभूत है एवं यहाँ वह कभी सुखप्रद नहीं है। इसलिए हे श्रीरामजी, असत्
और अनर्थरूप दृश्यादि की आप भावना न कीजिये, अब निर्वाण में स्थित रहिये