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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 12

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 12

संस्कृत श्लोक

शुक्तिकारूप्यसदृशं प्रेक्षितं यन्न लभ्यते । अर्थकार्यपि तन्नास्ति किमत्रापह्नवेन च ॥ १२ ॥

हिन्दी अर्थ

शुक्तिका में चाँदी के समान, विचारकर देखने से जो कुछ उपलब्ध नहीं होता, वह पुरुषार्थ का सम्पादक कभी नहीं है । इस तरह के दृश्य में अपहृव से क्या हुआ