Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 37, Verse 83
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 37, verse 83 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 37 · श्लोक 83
संस्कृत श्लोक
चिति चित्त्वं यदस्त्यन्तर्जगदित्येव भाविते ।
भेदो द्रवत्वपयसोरिव नात्रोपपद्यते ॥ ८३ ॥
हिन्दी अर्थ
तब इनमें कौन-सा पक्ष प्रामाणिक है, उसको बतलाते हैं /
वस्तुतः चिति में जो चित्त्व है यानी त्रिपुटी प्रकाशन की (0) शक्ति है, वही भीतर भावित होने
पर "जगत् रूप से भासती है । इसलिए चिति और जगत् में भेद ऐसे उपपन्न नहीं होता, जैसे जल
ओर द्रवत्व में